पुरुष होना…

उसे समझदार कह कर
छीन लिया उस से
दुलार, खिलौने और बचपन.

फिर समझदार कहा
दूर हो गया उस से
जिद,बेबाकी और अल्हड़पन.

समझदार होते ही
लिपट गई उस से
जिम्मेदारियां और खालीपन.
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,24

(अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)

बागवां

कलियों को मात्र उपस्थिति से खिला दे
स्नेह भाव से पुष्पों को संरक्षित कर दे।
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जो हर भाव को साकार करने का रखे हौंसला
तो क्यूं न, क्यारी पुनः पुनः हृदय उसी पर वार दे।
अपर्णा शर्मा
Nov.12th,24

इनाम

वो जो धीर, गंभीर सी शख्सियत देखते हो
आज जिसे, सिर्फ सलाम,दुआ से पहचानते हो
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कभी वो भी,हर महफिल को गुलजार करता था
शायद समझदारी का तमगा उसे इनाम मिला हो।
अपर्णा शर्मा
Nov.5th,24

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