बचपन को खेल-कूद में जी गए
कितनी ही चोटें, रोकर भूल गए।
कभी खेल के उत्साह में आगे बढ़ गए
कभी अकेले रोने के डर से चुप हो गए।
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तमाम झमेलों के संग खाई जवानी में चोटें
दिल पर लगी चोटों पर, अकेले में रोते।
कामयाब, नाकामयाब के हजारों ही मसले
दिल में कसक बन, घाव आज भी रिसते।
शरीर पर गहनों से सजे है आज भी चोटों के निशान
कुछ दिलों पर चोट देकर, रहते हैं जैसे हो अनजान।
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सुना है,बुढ़ापे की चोट दुखती बहुत हैं
जानते हैं सभी, फिर भी दिल दुखाते बहुत हैं।
अपर्णा शर्मा
Jan.2nd,26
