भंवर

जीवन रूपी भंवर से, कोई निकल न पाए
आस लगे उबरने की, त्यों-त्यों फंसता जाए।

नदियों के गहरे भंवरों से,कब का बचना सीख गया
पर जीवन के मोह भंवर में,खुद ही जाकर फिसल गया।
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असीम आकर्षण होता इस भंवर में, आकर्षित कर ही लेता है
पास जाए बिन,मन न माने और ये अपनी बाहों में भर लेता है।

भंवर चक्र में, फंसकर मानव, खूब चक्र सा घूमे
प्रेम-पाश में फंसकर, फिर वो, अपना लक्ष्य भूले।
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सारी शक्ति, तिल-तिल कर,इसी भंवर में सोखी जाती
कैसे कर ? बाहर निकलूँ , कोई चाल समझ न आती।

मोह का भंवर जब शांत हो,ऊर्जा कुछ न बचती
बाहर अगर आ गया,तब तक,जीवन टूटी नैया होती।
अपर्णा शर्मा
August 8th,2025

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