कैलेंडर

कुछ ख्वाहिशें,जो ख्वाब थी ,बन गई
उस ख्वाब को अब फिर हौसला दे गई
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बारह मास के इस तारीख-ए-गुच्छ में
उम्मीद की रोशनी फिर दीदार दे गई.
अपर्णा शर्मा
Jan.2nd,24

गलत

हर गलत को जब जब सही किया
तब तब नया व्यक्तित्व गढ़ता गया.

हर गलती समझदार बनाती रही
यूँ मासूमियत से दूर होता गया.

हर गलत पर इंसान बनता रहा
और अपने से,बहुत दूर होता गया.

कुछ बहुत सही सा था मेरे लिए
वो गलत सा सबको चुभता गया.

जब गलत को गलत कहा जोर देकर तब वजूद सच का खो सा गया.

अपर्णा शर्मा
Dec.29th,23

मुकाम

समझ ज्यों बढ़ती गई,
मासूमियत खोती रही.

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मुकाम पार करती गई
जिंदगी तमाम होती रही.
अपर्णा शर्मा
Dec.26th,23

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