जो सभी अनकही को जुबां दे जाती है
वो सारी बतकही निगाहों से हो जाती है।
ये नहीं कि सिर्फ मोहब्बत का इजहार करती हैं
खामोशी से हर बात से साफ़ इंकार करती हैं।
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ग़मों का सैलाब जो दिल में बाँध कर रखा था
ये पनीली निगाहें सारे दर्द को बयां करती हैं।
मेरी और उसकी और न किसकी किसकी कहे
ये बोलती निगाहें सभी की चुगली खूब करती हैं।
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यारों की महफ़िलों में जब हँसी मज़ाक सजते हैं
वहीं दो निगाहें चार हो कर नई दुनिया बसती है।
मैं जी रहा झंझटों में, वो भी कुछ झमेलों में फंसा है
जब मुस्कुराए,ये निगाहें तो जिंदगी आसान होती है।
अपर्णा शर्मा
July 19th,24
पदचिन्ह प्रेम के
घुँघरूओं की रूनझुन से दूर
प्रेम पदचिन्हों की छाप
मन आँगन के द्वार पर ली जैसे
नववधु के प्रथम पग की छाप।
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सहेज कर रखा है उसे
कोरे मन की श्वेत चादर पर
संदूक के कोने में समेट कर
दाग से बचा, सम्भाल कर।
प्रेम का विछोह,दर्शित है
उर्मिला के जीवन की सच्चाई में
प्रेम मात्र पाना नहीं, है खोना
खो जाना अनंत प्रेम की गहराई में।
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प्रेम के चरण चिन्हों को
अपने मन मंदिर में सजाकर
और चरण वंदन करता रहूँ
जीवन के हर शुभ अवसर पर।
अपर्णा शर्मा
July18th,24
‘मैं’
हम तो अपनी ही ‘मैं’ में इस कदर जिए जा रहे हैं
बहुत पड़ा है जीवन,सोचकर ‘मैं’ में इठलाए जा रहे हैं।
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आजकल वो सबसे कह रहा, मुझमे मेरी ‘मैं’ बोलती है
‘मै’, तो ‘मैं’ है,अपनी ‘मैं’ रहती, किसी को कुछ नहीं समझती है।
अपर्णा शर्मा
July 16th,24
