ख़्वाहिश

ख़्वाहिश है कभी अंगड़ाई,कभी परछाई,कभी
मुस्कराती।
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कभी पूरी,कभी अधूरी,कभी जिम्मेदारियों में कुनमुनाती।
अपर्णा शर्मा
6th June 23

सांसों का ताना बाना

जीवन के खुले मैदान में
सांसो का अजब सा खेला है।
जिसने सांसो को बाँध लिया
उसने ही खेल को जीता है।
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आती जाती इन सांसो में ही
जीवन का मधुर संगीत बसा.
जिसकी सांसे साथ छोड़ चली
उस घर फिर उल्लास कहाँ दिखा?

सांसों की कीमत वो जाने
जिनके अपने बिछुड़ गए।
अपनी सांसे हरपल बोझ लगे
बिछड़े की साँस पर विचार करे।
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जीवन है धागे सा
जो तकली सा नाच नचाए।
सांस के तानेबाने से
जीवन हरपल बुनता जाए।
स्वरचित:
अपर्णा शर्मा
2nd June 23

तानाबाना

जीवन है धागे सा जो तकली सा खूब नाच नचाए

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साँस के तानेबाने से जीवन हर पल बुनता जाए।
अपर्णा शर्मा
30th May 23

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