क्षितिज सी जिंदगी



जिंदगी की टेढ़ी मेड़ी डगर में
मसले हर दौर के हर शहर में
झुकने को बहुत मजबूर करते
जिंदादिली से खड़े हर पहर में.


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दुख के बादलों से जब घिरे
बिजली कहर सी जब गिरे
जमीन आसमाँ का क्षितिज
बस दूर से ही मिलन सा लगे.

ठहरी सी जिंदगी में जब
कोई थाह ना दूर तलक
बर्फ सी जमी हर सोच पर
दीर्घ होती रात हर रात तक.


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चेहरे पर मुस्कान सजाए
दिन इस झूठ पर बिताए
जब कोई समाधान न दिखे
चिंता में रात आग सी जले
अपर्णा शर्मा

5,May 23

अकेलापन


व्यस्तता के दिनों में अकेलापन स्वप्न सा दिखे
और इस प्रिय स्वप्न में अकेलापन झूला सा झूले।

व्यस्त ज़िंदगी में फुर्सत के पल सुकून से पले
अकेले होने के लाभ नज़र में रहते हैं हर पल बसे।

लाचारीवश अकेलापन जीवन में जब आए
अंधेरों में कराहाए और उजालों में भी डराए।
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ऊपर से शांत झील सा,अंदर समंदर सा मचलता
अकेलापन वज़ूद को शनैः शनैः खोखला ही करता।


स्वयं का अपनाया अकेलापन जन्म देता नए सृजन का
आत्म ज्ञान और आत्म बोध से नव व्यक्तिव को खोजता।
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वहीं थोपा हुआ अकेलापन आ जाए गर जीवन में
अति शक्तिशाली व्यक्तित्व भी घिर जाए अवसाद में।

एकांत हेतु अकेलापन है मानो सर्वश्रेष्ठ उपहार
मजबूरीवश अकेलापन से होता रोगों का आगाज।
अपर्णा शर्मा April 28th, 23

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