धुँधला गई थी जो लकीरें
वक़्त बदलते ही गहरा गई
मुलाकात होते ही उनसे
सब शिकायतें धरी रह गई .
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वक़्त की चादर ने ओढ़ी थी
जो आज से मूँद कर आँखे
वक़्त का कमाल तो देखो जरा
उसी चादर पर कसीदे निकाल रही.
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हालात से मजबूर हो कर
बंद करदी थी जो वक़्त ने किताबे
वक़्त के सही और सही होते ही
खुली किताब सी सारी पढ़ी जा रही.
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वक़्त के सितम देखो,चेहरे पर
लकीरों से खिंचते चले गए
वक़्त की मेहरबानी रहनुमा पर
ऐसी रही कि उसे तजुर्बा नाम दे रही.
अपर्णा शर्मा
June14th,24
ज़माना
गर कोई दीवार सा हो जाए, जो सभी को समझे ,ज़माना उसे सुना जाए
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वो सुने सभी की,ना कुछ कहे, नया चरित्र भी उसी का गढ़ जाए.
अपर्णा शर्मा june11th,24
जाने क्या बात है
अलसाई सुबह में सूरज सी उगती उसकी यादें
हर सुख दुख की जिससे बांटी मैंने सब बातें
वो कुछ ना होकर भी बहुत अपना सा लगता है
हाँ वो मेरे दिल में बसता है.
जाने क्या बात है…
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कुछ दिन से वो भरमाया सा रहता है
हर बात पर बेपरवाह सा दिखता है
जिस के बिना दिन बीते आधे अधूरे
अब वो उखड़ा उखड़ा रहता है.
जाने क्या बात है ….
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सब सुविधाओं को जुटा कर मैंने
हर सुख जमा करने की ठानी मैंने
फिर भी कुछ ,कम कम लगता है
संसार कुछ कम सा लगता है.
जाने क्या बात है…
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जिस घर में बचपन बीत गया
हर कोने में यादों का ढेर रहा
मालिक बदलते देखे जिस घर के
अब अपना सा कम लगता है
घर बिखरा बिखरा लगता है.
जाने क्या बात है….
अपर्णा शर्मा
June7th,24
