बचपन के खेल निराले
कभी पानी में नाव तैरातें
बेमतलब की दौड़ लगा कर
रेत के फिर घर बनाते।
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अपने घर के अभियंता बनकर
वास्तुकार सा सुन्दर घर सजाकर
चेहरे पर खिलती मोहक मुस्कान
अब घर बिल्कुल बनकर हुआ तैयार।
बचपन देखे, जहाँ रेत का टीला
पानी डालकर करता उसको ढीला
न कोई नींव,न उसको कोई ज्ञान
और भरभरा कर गिरती गृहशाला।
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तब बचपन को लगता पहला धक्का
दुनिया क्षणभंगुर,कुछ न पक्का
भाई, बहन और घर का संग भी
सब कच्चा,बस सबमें प्रेम ही सच्चा।
अपर्णा शर्मा
August,1st,2025
