जब वालदैन द्वारा,अपने ही बच्चों को अपना वालदैन बनाना
जैसे, जहां से शुरु किया सफर, फिर वहीं आकर ठहर जाना।
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जी कर पूरी जिंदगी का चक्कर, और एक फलसफा कह जाना
फिर एक सुबह खुद अफ़साना बन, दुनिया को अलविदा कर जाना।
अपर्णा शर्मा
May, 27th,25
शुभचिंतक
अब उनसे बात नहीं होती जो हर हाल हौसला बढ़ाते रहे।
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दुःखों की घोर बारिशों में जो सुखों का आसमाँ दिखाते रहे।
अपर्णा शर्मा
May13th,25
अमलतास
अग्नि से जलते फूल नहीं,झाड़फानुस लगते हो।
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शीतल समीर संग तुम, चेहरों पर मुस्कान देते हो।
अपर्णा शर्मा
May 6th,25
