श्रृंगार और सादगी



मानव और प्रकृति सदा से श्रृंगारित होती आई
अपने स्वगुणों से दोनों ने सदा पहचान बनाई।

मानव मन को श्रृंगार सदा खूब ही भाया
सो जन्म से मृत्यु तक गुणों को खूब बढ़ाया।

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भोला,जिज्ञासु बालक,कभी लक्ष्य का पीछा करती,तरुणाई
स्त्री का ममत्व सा प्रबंधन,वहीं पुरुष की धीरजता,संतुष्टि लाई।

भद्रजनों का स्नेह भरा व्यवहार जीने की कला सिखाता
मन के श्रृंगार से तन की सुंदरता का उत्तम ज्ञान कराता।

गुणों में वृद्धि,सुंदरता में वृद्धि कर अवगुणों को मिटाती
मानवगुणों से सज कर श्रृंगार की सादगी मन को भाती ।

जो बीत गया

जो बीत गया सो बीत गया
कल से भी आशा क्या रखना.
आज ही में सब कुछ छुपा हुआ
आने वाले पल का बस ये कहना।

जाने वाले को कौन रोक सका
चाहे कितने भी जोर लगा लो.
हरदम एक से बन कर रहना
आने जाने का फर्क़ मिटालो।

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जब तक जिसको रहना है
सर्वश्रेष्ठ अपना उसको देते रहना
चला जाए तो चला जाए
मन में मलाल कभी मत रखना।

जो भी हो मन में,कह देना
फिर चुप्पी ही रह जाएगी
कहदो क्या कहना,क्या सुनना
फिर चुप्पी ही कहर बन जाएगी।

देहरी के पार

धीरे-धीरे अवधि समाप्ति पर आई है
विदाई की बेला पास और पास आई है।

समेट लिया उसने बक्सा समय का
बना लिया बही खाता हर तारीख का।

भर लिया हँसी खुशी की यादों का खजाना
टंगा है थैला भी, जिस में बोझ है दुखों का।

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जा रहा है,सबके कुछ ना कुछ काम करके पूरे
दे जाएगा, नवागत को, जो रह गए काम अधूरे।

देहरी के दूसरी ओर , कुछ पग की दूरी पर
वो खड़ा है, उत्साहित सा अपने आगमन पर।

आगत की खुशी और विगत के विदाई की विडंबना
विदाई ले 2022,थमा देगा 23 को सभी कार्य योजना.

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