यादें बहुत सताती हैं

यूँ तो भूली सी रहती है
गुपचुप सोयी रहती है
किसी बात पर किसी काम पर
चुपके से डेरा जमाती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

दादी नानी के लाड़ प्यार में
दादा नाना के रौब दाब में
बचपन की हर कारस्तानी में
छुप कर बैठी रहती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

विद्यालय के कोने,कक्षों में
खेल के हर संगी साथी में
शैतानी की फुलझड़ियों में
रोज शाम को आती हैं
ये यादें बहुत सताती हैं।


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अल्हड़पन की मस्ती भरी
दैनिक दांवपेंच की खिलंदड़ी
कड़क चाय सी तृप्ति भरी
जीवन में रंग भर जाती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

युवा मन की जिम्मेदारी में
जीवन को सर्वोत्तम बनाने में
मित्रों, रिश्तों की खुशियों में
रोज ही पैर पसारती है
ये यादें बहुत सताती हैं।

ऋतु पर्व



मकर संक्रांति से पूर्व की रात्रि
शरद ऋतु की अंतिम दीर्घ रात्रि।

लोहड़ी का पर्व मनाते,गाते बधाइयाँ
बाँटते रेबड़ी,मूँगफली,गिद्दे पाती लड़कियां।

लकड़ी,कंडे सजी लोहड़ी,और दूल्ला भाटी की कहानी
बहू बेटियों को आशीषों से नवाजती दादी नानी।

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खूब उत्साह से परिपूर्ण होती लोहड़ी की रात्रि
अभ्यागत प्रातः,सूर्य की मकर राशि में होती संक्राति।

उत्तरायण को तत्पर आज से ही प्रत्यक्ष प्रभु
पोंगल, बिहू, अनेकों नाम से पूजे जाते भानु।

खिचड़ी,तिल,गुड़ खाने और दान की पुरातन परिपाटी
वहीं रंग-बिरंगी पतंगे,पर्व में पूर्ण उत्साह भरती रीति।

नई ऊर्जा से दीप्त हम कर रहे उत्तरायणी सूर्य का स्वागत
नई ऋतु,नई फसलों का उत्सव मन रहा अवनी से अंबर तक। अपर्णा शर्मा Jan.13th,23

श्रृंगार और सादगी



मानव और प्रकृति सदा से श्रृंगारित होती आई
अपने स्वगुणों से दोनों ने सदा पहचान बनाई।

मानव मन को श्रृंगार सदा खूब ही भाया
सो जन्म से मृत्यु तक गुणों को खूब बढ़ाया।

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भोला,जिज्ञासु बालक,कभी लक्ष्य का पीछा करती,तरुणाई
स्त्री का ममत्व सा प्रबंधन,वहीं पुरुष की धीरजता,संतुष्टि लाई।

भद्रजनों का स्नेह भरा व्यवहार जीने की कला सिखाता
मन के श्रृंगार से तन की सुंदरता का उत्तम ज्ञान कराता।

गुणों में वृद्धि,सुंदरता में वृद्धि कर अवगुणों को मिटाती
मानवगुणों से सज कर श्रृंगार की सादगी मन को भाती

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