अवसाद के दिनों में

निकल पड़ो तुम अपनी धुन में
मंजिल खुद ही दिख जाएगी
छोड़ो डरना मन ही मन में
कि ये राह किधर को जाएगी।
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याद करो वो बचपन के दिन
हर कदम बढ़ते बढ़ते था डुगलाया
फिर भी चलते-चलते कब सोचा
कि ये राह किधर को जाएगी।

जब जब दौर चला मुश्किल का
तब तब नया रस्ता था आजमाया
ऐ दिल क्यूँ है तू डूबा डूबा सा
कि ये राह किधर को जाएगी।
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वक़्त कभी न ठहरा है
ये वक़्त भी गुजर जाएगा
क्यूँ सोच सोच कर हैरां है
कि ये राह किधर को जाएगी।
अपर्णा शर्मा
June 5th, 2026

वक़्त की चाल

जिंदगी के मकड़जाल में यूँ फ़ंसा
हरबार वक़्त की चाल में मैं कसता रहा।

एकांत में देर तक बस यहीं सोचता रहा
क्यूँ कर मैं ही हर बार जाल में फंसता रहा।
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जिन समस्याओं का समाधान सामने था खड़ा
नाहक ही उन फैसलों से मुँह मोड़ता रहा।

जिंदगी के सभी झंझावात से लिपट कर
नाहक सुकून के पल यूँ ही गवांता रहा।
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सब छोड़ कर दूर निकलते निकलते
वक़्त को हर वक़्त यूँ ही टालता रहा।

छोड़ यार कह कर मुकरने के दिन गए अपर्णा
अब वक़्त पर वक़्त को जवाब देने का वक़्त आ रहा।
अपर्णा शर्मा
April17th,2026

खनकती चूड़ियां

सूरज के उगने से पहले
चिड़ियों के कलरव से पहले
उठ जाती,माँ के हाथों की चूड़ियां
खूब खनकती चूड़ियां।
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घर के हर कोने-कोने में
हर काम के पूरे होने में
माँ की हर आहट पर
खूब खनकती चूड़ियां।

छन छन कर गीत सुनाती
भोजन में स्नेह रस मिलाती
मधुर आवाज की तान सी
खूब खनकती चूड़ियां।
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भगिनी के हाथों में अल्हड़पन सी
भाभी के हाथों में मर्यादित सी
माँ की ममता से भरी भरी
खूब खनकती चूड़ियां।

श्रृंगार चूड़ी बिन रहे,सदा अधूरा
जैसे बिन बासंती, बसंत हो बौरा
रंग बिरंगी काँच की नाजुक
प्रेम चिन्ह है ये चूड़ियां।
अपर्णा शर्मा
April 4th,2026

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