इश्क मुखर हो गया



कोई दिल को भा गया
रोम-रोम में समा गया ।
नज़रे बोलती रही
लबों पर मौन छा गया ।

ख़त जब उसे लिखा
बस नाम ही था लिखा ।
भावनायें बोल रही
शब्द मौन हो गया ।

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आचरण सब बदल गया
व्यवहार कुशल हो गया ।
सब हैरां से देख रहे
चापल्य मौन हो गया ।

समय ठहर सा गया
ख़्याल ने ख़्याल जिया ।
चित्त हर्षित हो रहा
इश्क मुखर हो गया । अपर्णा शर्मा

मुआयना

जिंदगी के हर खुशनुमा पल में, जब देखा आईना
ग़मों की टीस,दर्द की चीस से होता रहा सामना ।

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ग़म के सागर में,डूबते तैरते,गुजर गई ना जाने कितनी रातें
खुशी के पैमाने छलके,तो भी नींद के इंतजार में थी रातें ।

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उसकी आँखें ही,मेरे हर अक़्स का हमेशा रही आईना
हर खुशी, ग़म का करती रही जो ताउम्र मुआयना ।

सूने होते घर

जब सुबह सवेरे,बिना हड़बड़ी के,काम शुरू हो जाते हैं ।
और बिना,हो-हल्ला के,काम समय पर संपन्न हो जाते हैं ।
घर की अनुशासित दिनचर्या, नित्य सूनापन दर्शाती है ।
बिन कहे ही,जीवन में पसरे सूनेपन को कह जाती हैं ।

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खड़ी-खड़ी साइकिल का,धीरे-धीरे,कबाड़ बन जाना ही ।
कस्तूरी वस्तुओं का,चुपके से गोदाम में जमा हो जाना भी ।
वस्तुओं का यूँ स्थिर हो जाना,घर का सूनापन बतलाता है ।
बिना कहे ही,जीवन मे पसरा सूनापन कह जाता है ।

शाम की दिनचर्या में,जब घर के मंदिर में,दिया जलाया जाता है ।
दूरगामी सदस्यों हेतु भी,हाथ दुआ को,खुद-ब-खुद उठ जाता है ।
रुखी-रुखी आँखों से,तब अपनों का सूनापन बह जाता है ।
बिना कहे ही, जीवन में पसरा सूनापन कह जाता है ।


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नौकरीपेशा सदा ही,घर-गाँव से दूर,देश-विदेश में बसते हैं ।
कभी शिक्षा,कभी रोजगार,अपनों से दूर रहने को मजबूर होते हैं ।
आँगन में चाँदनी,परदेश की सिमटी दुनिया का, सूनापन बरसाती हैं ।
बिना कहे ही,जीवन में पसरा सूनापन कह जाती है ।

कभी-कभी सद्भावना की कमी,घर में ,घर कर जाती है I
मेरा-मेरा का भाव भी,दूर,फिर दिल से दूर कर जाता है ।
घर के कक्षों के ताले,अपनों का सूनापन बतलाते है ।
बिना कहे ही,जीवन में पसरे सूनेपन कह जाते हैं ।

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