प्रातः काल के काम काज को समेट.
फुर्सत में क्यूँ कर हम फोन लगाते?
पंख लगा,फुर्र होते,ना करवाते वेट.
मिलते उनसे जो वर्षों राह है तकतें.
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पंख लगा मिल आती उस बूढ़ी माँ से.
दिनभर बतकही चलती न जाने किस से .
सूना घर,सूना मन,नैन प्रतीक्षा को तरसे.
मिलवा देती उसके प्यारे बिठा उसे पंखों पे.
भोजन,कंबल,कपड़ा देती रात अंधेरे.
जिनके घर बने ये रात के सोए रास्ते
वो भी जीते शायद कुछ पल सुकून से
पंख होते, देखती कौन दुख में सोया रे.
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पंख होते तो क्या-क्या कर देते.
मिलते रोज-रोज अपने प्रिये से.
दूर करते सबके शिकवे, मन से.
शायद,फिर वो करते तौबा हमसे.
अपर्णा शर्मा
Feb.7th,25
प्रतीक्षा
स्मृतियों का हृदय से धूमिल न हो पाना
प्रतीक्षित का भी दर पर न आ पाना
जीवन में दोनों का खण्डित रह जाना
दहलीज पर प्रतीक्षा होती है
जीवन को आशा से भरती है।
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जीवन की ढलती साँझ तक
उमर के अंतिम पड़ाव तक
प्रतीक्षा के विस्मृति होने तक
दहलीज पर प्रतीक्षा होती है
जीवन को आशा से भरती है।
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वो यादें हैं जीवन संगिनी सी
साँसों की लयबद्ध सरगम सी
साँझ की यह प्रतीक्षा प्यारी सी
उदास दहलीज संवारती है
जीवन को आशा से भरती है।
अपर्णा शर्मा
Jan.31st,25
प्रतिबिंब
नदी के शांत से, शीतल जल में
प्रतिबिंब जो उभर कर आया
गहरे छिपे मन के भावों का
चेहरे पर अस्तित्व नजर आया।
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केशों की उलझी उलझी लटाओं में
मन की उलझन गहराई है
निर्जन से दिखते इन व्याकुल नयनों में
प्रतीक्षा प्रतिपल की समाई है।
किया गर जल आचमन अनजाने में
प्रतिबिंब जल में रिल-मिल जाएगा
कल्पित स्वर्ण संसार रचा जो मन में
क्षण में, क्षणभंगुर हो बिखर जाएगा।
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मन के एहसासों को गहरा छिपा कर
कई चेहरे लेकर जो फिरता है
अक़्स देख कर आज जल दर्पण में
विस्मित सा प्रतिबिंब दिखता है।
जो सदा छिपाया दुनिया भर से
अपने से न छिप पाया
मन की परछाई उभरने मात्र से
किंकर्तव्यविमूढ़ नज़र आया।
अपर्णा शर्मा
Jan.24th,25
