समय अनमोल

उत्तम समय प्रिय आशीष सा.
अधम समय अभिशाप जैसा।

समग्र प्रकृति समय के निहित.
कालचक्र सी निरंतर चलित।
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समय धन ही सबसे अनमोल.
क्रय न होता किसी भी मोल।

समय की गति का रखा जो मान.
समय बना उत्तम,बना भाग्यवान।
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समय को कभी न करना नष्ट.
रुष्ट समय करता जीवन नष्ट।

समय को बनाओ सदा उपयोगी.
पाओ जीवन में जो मन में सोची
अपर्णा शर्मा June 20th,25

दिल

अनुराग संगीत का पान कर
बजता रहे जब उसमें गीत मधुर
नाचता है होकर वो अलमस्त
यूँ चहकता खूब है दिल.

समीर मंद सी बहें, प्रीत की
सुरभि हो, शहद, गुलकंद की
फूस, जेठ के शीत,ताप से परे
यूँ महकता खूब है दिल.
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प्रीत की बारिशों में भीगा
जलबिंदुओं को मोती समझता
प्रेम वर्षा में पूर्ण भीग कर
यूँ स्वर्ण सा चमकता है दिल.
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कनक ताप में तप कर
तपिश को स्वीकार कर
क्षणिक मुश्किलों को समझ
यूँ तपता है प्रेम ज्वर में दिल.
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गर कभी,
नफरतों से हो सामना
अग्नि बाणों सा बरसता
प्रत्यंचा खींचकर,क्रोध चाप की
फिर यूँ तमकता है दिल.
अपर्णा शर्मा
June 13th,25

रिश्तों की डोरी

जस की तस दिखती हुई रिश्तों की नाजुक डोरी
कुछ ढीली कुछ खिसकी है प्रीत की गठरी
सिलापन प्यार का कुछ सूखा सा लग रहा
कुछ हैरान सी दिख रही हैं ये जिन्दगी.
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अपना वज़ूद खोकर जो उसी का भला सोचता रहा
जो मात्र उसी से अपने को हमेशा बाँधता रहा
आज क्यूं उसे अपना अंतर्मन ही वेदना में दिखा
रिश्तों में स्नेह का अस्तित्व कुछ डगमगा सा रहा।

कारवाँ सी आगे ही आगे जा रही थी जिंदगी
नदियों के वेग सी जो, रहीं सदा ही बढ़ती
जिंदगी सिमट कर,रह गई बस अपने तक
सूख गई अचानक ये पोषित रिश्तों की नदी।
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कल्पना से परे यथार्थ होती है रिश्तों की डोरी
भावनाओं से परे की कशमकश है रिश्तों की डोरी
छल कर मासूमियत को बार-बार समझदार बनाती
थोड़ा सा स्व स्वार्थ सिखाती है रिश्तों की डोरी।
अपर्णा शर्मा
June6th,25

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