विवाह अब मात्र आयोजन


जब से,देश में ,विवाह होने लगे हैं आयोजित
घर से दूर,मैनेजर करने लगे हैं,सब समायोजित।

जहाँ दोनों पक्षों के ओर की, संपन्नता को तौला जाता
फिर उसे क्रमबद्ध योजना के तहत किनारे लगाया जाता।

अब रिश्तेदार भी, विवाह में रस्म अदायगी को होते उपस्थित
भावनात्मक रूप से दूर, दूर-दूर तलक रहते है अनुपस्थित।

सब अजीब सी दौड़ में फंसे, एक दूजे को नीचा दिखाते
इस सब में वर-वधु, शुभ आशीषों से वंचित रह जाते।

आयोजित विवाह में, रीति-रिवाज नाम मात्र को होते
अधिकांशत रिवाज, अब दिखावे और बनावट के केंद्र ही होते।

दोनों पक्ष, पूरे विवाह, एक दूजे को पैसे से तौलते
निभाव, कर्तव्य, जिम्मेदारी की सीख कहाँ देते?

जब तक विवाह,घरों में संस्कार के लिए जाना गया
विवाह एक मजबूत संस्था सा पोषित होता गया।

विवाह जीवन का एक संस्कार नहीं व्यापार बन गया है
जब से विवाह एक अनूठा सा आयोजन बना दिया गया है।

सच यह भी है,आयोजन की उम्र कब लंबी होती है?
एक आयोजन पूरा,दूजे आयोजन की तारीख पक्की होती है।
अपर्णा शर्मा
August 30th,24

छल

अपना बना कर वो,साथ चलता गया
धीरे-धीरे सभी से,बहुत दूर करता गया।
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समझ न सका,वो दोस्त रहा या रहा दुश्मन
जो अपनों से दूर ,तन्हा कर,सबकुछ हो गया।
अपर्णा शर्मा
August 27th, 24

निन्यानवे का फेर


जीवन का बड़ा ही,अजब गजब सा खेल है
अक्सर मुझको लगता, ये निन्यानवे का फ़ेर है.
सारा जीवन शत प्रतिशत खुशियों की चाह रहती है
पर कुदरत भी, सौ में एक सुख की,कटौती कर देती है।
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इसी एक सुख की चाह में, जीवन से उचटा रहता मन
कैसे मिले? कब मिले? इसी सब में खोया रहता मन
और उन निन्यानवे सुख को सिफर करता है मानव
एक के पीछे दौड़-दौड़ कर,आधा कर लेता तन मन।

कभी खुदा जब, जीवन में, सभी सौ सुख दे देता है
मानव उसमें खोया-खोया, सब कुछ भूला सा रहता है
तभी अचानक, एक दुख जो दाखिल हो जाए, जीवन में
वो एक दुख ही, जीवन के सौ सुख पर भारी होता है।
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इस जीवन में, जैसा है, जितना मिला वरदान में
उसमें ही दुनिया खोजे और सदा जिए वर्तमान में
धन में ही नहीं, इस जीवन में भी, निन्यानवे का फ़ेर है
छीन लेता,जो सारे सुख चैन,सो, जिए सब इत्मीनान में।
अपर्णा शर्मा
August 23rd,24

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