शांत पड़े गहरे पोखर में ,आज हलचल मचती रही
यादों की कंकरी, पुरजोर, आज शोर करती रही।
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जिन यादों को,झील सा शांत समझ लिया था अपर्णा
उन यादों के, बवंडर में,ख़्यालों की सुनामी उठती रही।
अपर्णा शर्मा
Sept.10th,24
मैं जीना न छोड़ूंगा
जिस घर मैंने जन्म लिया
लाड़,प्यार और तकरार किया
उनको रोता कैसे छोडूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।
जिन गलियों में पतंग सा उड़ा
यारी,दोस्ती का इतिहास बना
उनको कैसे भूलूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।
भविष्य के उज्ज्वल होने में
दबाव बहुत हो मस्तिष्क में
नए विकल्प मैं खोजूगा
मैं जीना न छोडूंगा।
इंजीनियर,डॉक्टर ही जीवन नहीं
कोई काम छोटा समझूँगा नहीं
इक खिड़की मन की खोलूँगा
मैं जीना न छोड़ूंगा।
बेहतर भविष्य खुद बन जाएगा
ग़र बेहतर मनुष्य बन जाऊंगा
मैं पलायन न अपनाऊंगा
मैं जीना न छोडूंगा।
अपर्णा शर्मा
Sept.6th,24
पहचान
मोहब्बत-ए-पैगाम,हर्फ दर हर्फ दिलों में घुलता गया।
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हर्फ ही हैं,जो इंसान की इंसान से पहचान करा गया।
अपर्णा शर्मा
September 3rd, 24
