बागवां

कलियों को मात्र उपस्थिति से खिला दे
स्नेह भाव से पुष्पों को संरक्षित कर दे।
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जो हर भाव को साकार करने का रखे हौंसला
तो क्यूं न, क्यारी पुनः पुनः हृदय उसी पर वार दे।
अपर्णा शर्मा
Nov.12th,24

विरह

मैं भी अब मैं कहाँ रहा
तुम हो गया हूँ।
तुम्हारे साथ मैं भी
कहीं खो गया हूँ।

जहाँ तुम्हें देखता
फिर रहा
वहाँ अपने को
पा रहा हूँ।
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हर जगह तुम्हारी ही
छाप है
दिल ओ दिमाग में
तुम्हारा नाम है ।

इस दुनिया में
अजनबी अब
एक झलक को
तरस रहा हूँ।
अपर्णा शर्मा
Nov.8th,24

इनाम

वो जो धीर, गंभीर सी शख्सियत देखते हो
आज जिसे, सिर्फ सलाम,दुआ से पहचानते हो
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कभी वो भी,हर महफिल को गुलजार करता था
शायद समझदारी का तमगा उसे इनाम मिला हो।
अपर्णा शर्मा
Nov.5th,24

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