बता! जिंदगी तू और बता

पतझड़ सा तू खूब सताती रही
कभी सदाबहार सी खिलती रही।


बसंत की मीठी सुगंध महक रही
कभी पतझड़ की उदासी छाई रही
तेरे इन अंदाज पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू शरारतें कर शोखियाँ दिखाती रही
कभी बुलबुला बन कर बिखरती रही।

ठोकरों में तू हमेशा संभालती रही
कभी मंजिल देकर, तू छीनती रही
तेरे इस व्यापार पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू अपने इशारों पर नचाती रही
रुला कर भी,कभी हँसाती रही।

प्यार के पलों की उम्र कम ही रही
यादों के संग तू खूब जीती रही
तेरे इस नखरे पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
अपर्णा शर्मा
Feb.20th, 2026

पहचान


कौन है आप?

     शिशु के जन्म के पश्चात,शिशु को एक नाम से पुकारा जाता है. छोटा बालक उस नाम को ही अपनी पहचान मानता है और प्रत्येक कार्य को करने के बाद कहता है कि यह अमुक ने कार्य किया है. शनैः शनैः घर में उसे परिचित कराया जाता है कि अमुक नाम तुम्हारा है और वह उस नाम को स्वयं का परिचय समझ लेता है. उम्र में वृद्धि के साथ साथ, बालक अपने नाम के निमित्त कार्य कलाप करता है जिस से सर्वत्र उसके नाम को पहचाना जा सके और समाज में प्रशंसनीय एवं सम्माननीय व्यक्तित्व कहलाए.
        जीवन के किसी भी पड़ाव या मोड़ पर व्यक्ति को जब यह आभास होता है कि, क्या वह मात्र नाम ही है या कुछ और ?? तब वह वास्तविक पहचान हेतु चिंतन, मनन  में लीन हो जाता है. अंत में उसे बोध होता है कि वह मात्र शरीर नहीं है बल्कि शरीर और आत्मा दोनों का मिलाजुला रूप है.अब तक जो भी उसकी पहचान है मात्र शरीर की जिसका नाम अमुक है.
         तत्पश्चात,व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी अंतरात्मा की आवाज पर भी विचार करने लगता है. तब उसमे दैवीय गुण भी कार्य(परोपकार,सद्भावना,अहिंसा आदि) करने लगते हैं.इस प्रकार, एक व्यक्ति संपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तित हो जाता है.
        जब ऐसा व्यक्तित्व अपनी पूर्ण आयु कर इहलोक से परलोक को प्रस्थान करता है तब मात्र वह शरीर से ही प्रस्थान करता है जो कि नश्वर है परंतु अपने द्वारा किए गए नेक कार्यो से हमारे मध्य सदा ही विराजमान रहता है जो कि उसने अपनी आत्मा से अभिभूत हो कर किए थे.
        सारांश यह कि व्यक्ति शरीर और आत्मा दोनों का मिलकर बना रूप हैं. आत्मा विचार को जन्म देती है और शरीर उसे कार्यान्वित करता है. शरीर की पूर्णता के पश्चात भी वह अपने कार्यो में सदैव जीवित रहता है क्योकि आत्मा अजर अमर है.
अपर्णा शर्मा Feb.17th,2026

आ अब लौट चले

जब चला था अनजानी राहों में
सपनों भरी मंजिल की बाहों में
थक कर, जब भी लगा सुस्ताने
मन बोला, आ अब लौट चले।
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कर के अथक प्रयासों को
पाकर सुखद परिणामों को
जब  था हल्का सा मुस्काया
मन बोला, आ अब लौट चले।

काँटों पर चलते इस जीवन में
अंगारों से जलते इस जीवन में
जब भी शीतल बयार बही
मन बोला, आ अब लौट चले।
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इक दिन मैंने मन को ही सुना
सच में उस आँगन लौट चला
जाकर वहाँ सबसे अनजान हुआ
मन फिर बोला, आ अपनी मंजिल लौट चले।
अपर्णा शर्मा
Feb.13th,26

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