चल अकेला

सोचा है..
वो किस हद तक सहता होगा
आखिर में,
वो किस हद तक टूटा होगा।
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सोचा है..
वो किस हद तक बिखरा होगा
आखिर में,
वो किस हद तक सिमटा होगा।
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सोचा है..
वो जब सहते सहते टूटा होगा
बिखरा सा फिर सिमटा होगा।

आखिर में,
निराशा में ही आशा दिखती होगी
पगडंडी ही रस्ता होती होगी।
अपर्णा शर्मा
Oct.3rd,2026

डर

बीते हुए खूबसूरत पलों को जीना चाहता है
साथ ही अप्रिय पलों को बदलना चाहता है।
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वर्तमान की बेहतरीन कल्पनाओं में विचरता मनुष्य
अपने भविष्य से फिर भी थोड़ा डर जाता है।
अपर्णा शर्मा
Sept.29th,2026

पीर

मन की पीर कभी न कहिये,रखो दिल में छिपाए
होती बड़ी जग हँसाई,गर किसी को भनक लग जाए।

दर्द को बांटने वाले भी,होते हैं बातों के छलिये
कब ठग लेंगे जान न पाओगे,दुख को सुनते सुनते।
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सोच समझकर किसी को,अपनी पीर सुनाना
सारी दुनिया में गूंजेगा,फिर तेरी कमियों का तराना।

दुनिया को बस,सबके दुख पर ही हँसना आता
देख किसी की खुशियों को,भूल जाते वो मुस्काना।
अपर्णा शर्मा
Sept. 25th,2026

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