दो पंक्ति

आजकल विचार किसी कोने में छुप से गए हैं
कलम भी सच लिखने में झिझकती बहुत है।
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सच यह है, कि सच को पढ़ना,कोई आसान नहीं
लेकिन झूठ को सच सा लिखने में मुश्किल बहुत है।
अपर्णा शर्मा
March17th, 2026

ख्वाबों का जंगल

एक सुनहरी पगडंडी पर
निकला था वो सकुचा कर
ख़्वाब बसे थे उस रस्ते
चलता था वो इतरा कर।

धीरे-धीरे ख्वाबों के भी
उपजे थे उसमें अंकुर भी
ख्वाबों की नाजुक कोंपल सी
बसी थी दुनिया अंतरंगी सी।
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डगमग डगमग चलता जाता
ख़्वाब वनों का बसता जाता
कभी बसंत सा, कभी हेमंत सा
उसका ख़्वाब निखरता जाता।

घने ख़्वाब के जंगल में
खोया था अपनी ही धुन में
तभी जेहन में बिजली कौंधी
बहुत दूर था अपनों से।
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हर ख़्वाब पर फूल खिले थे
फूलों की खुशबू से महके थे
कीमत उसने बड़ी चुकाई
सारे ख़्वाब सच करने में।
अपर्णा शर्मा
March13th, 2026

रंगों के मौसम में

रंगों के इस मौसम में
अब रंग फीके से लगते हैं
फूलों के इस मौसम में
फूल भी कागज़ के दिखते हैं।

प्रेम रंग में डूबे इंसा
मुश्किल से ही दिखते है।
मानवता की बातें करने वाले
नफरत में डूबे रहते हैं।
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कच्चे रंगों के बाजारों में
पक्के रंग खो जाते हैं
रंगों पर दूजे रंग चढ़ते ही
पहले रंग धुंधले हो जाते हैं।

रंगों की बौछारों में भी
मन रीते ही रह जाते है
मन को उल्लासित कर दे
वो रंग बाजारों में न मिलते हैं।
अपर्णा शर्मा
March 6th,2026

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