खुशी का कोई मोल नहीं, सदा रही अनमोल
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ढूँढे से मिले नहीं, कभी मिल जाती बेमोल।
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ढूँढे से मिले नहीं, कभी मिल जाती बेमोल।
मन ही मन होता जब संवाद
हर प्रश्न के उत्तर होते लाजवाब।
जो मन को खुशी से झूमा दे बात
संतुष्ट हो मन,न उठे फिर विवाद।
अंतर्मन की हर दुविधा का प्रतिकार होता
स्व संवाद में मन सब को पटखनी दे देता।
संवाद के हर गुण में, मन दक्षता रखता
शिकायतों का पुलिंदा पूर्ण समक्ष रखता।
असल में ,जब संवाद के क्षण से टकराए
मिसरी सी आवाज पर धराशायी हो जाए।
त्याग कर सब विवाद,मतभेद भूल जाए
बात करने से,मन धवल सा चमक जाए।
विश्वास को नहीं पता अंतिम पल तक
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कैसे कपट हुआ,छला गया हर क्षण तक।