जिद

जो जिद लक्ष्य को पहुंचाए
मन में जगह बनाती है
गर लक्ष्य विहीन कर जाए
फिर कहाँ सुहाती है?
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बालहठ और स्त्रीहठ
प्रसिद्ध खूब है दुनिया में
युवामन की हठ से ही
नए आयाम पाए दुनिया ने।

कभी कभी बुजुर्ग भी
जिद पर ऐसे अड़ जाते हैं
घर-बाहर, सभी दिशा में
सबकी नींद उड़ाते है।
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जिद वहीं है,जो स्वयं ही
पाली पोसी जाती है
खुद को खूब खुश करे और
औरों के होश उड़ाती है।
अपर्णा शर्मा
Oct.27th,23

ठोकर

ठोकरें भी जरूरी सी रही जिंदगी में
जो ताउम्र सम्भल कर जीना सिखा गई।
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उड़ते रहे जो सारे जहाँ औ आसमाँ में
कि आंधियां पंखों को साध ना सिखा गई।
अपर्णा शर्मा
Oct.24th,23

फुर्सत में

अपने अपनों से मिलने
परदेस को है जब उड़ते
अपनों को यहाँ छोड़कर
क्या याद हमें भी करते?
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भागमभाग की जिंदगानी में
ऐसे फुर्सत के क्षण भी है आते
उनमें अपनों का अपनापन
क्या वे क्षण खूब रुलाते?
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यहाँ भी इंतजार की घड़ियां
मानो जैसे बंधन की कड़ियां
फुर्सत भी सूनापन गहराती है
देती यादों की जलबुझ लड़ियां।
अपर्णा शर्मा
Oct.20th,23

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