बचपन में एक सपनों का खाता खोला
जिसमें एक-एक कर सपनों को जोड़ा।
कुछ सपनों की आवृति जमा करी थी
कुछ सपनों का संचित खाता भी खोला।
सपनों को जमा करना भी एक सपना था
एक-एक को मेहनत से रखना अपना सा था
कुछ सपने जिम्मेदारी का सुखद एहसास भरे
कोई एक दो सपना वज़ूद से बढ़कर रखा था।
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अचानक से सपनों के बैंक से संदेश आया
खाता बंद होने की धमकी का फरमान सुनाया
सपनों की किताब लेकर ,मैं झटपट हाजिर था
बैंक लिपिक ने फिर मुझे कुछ यूँ समझाया।
गर तुम ऐसे ही, केवल सपने जमा करते जाओगे
सपन-निकासी का न कोई उपाय अपनाओगे
फिर सपनों का खाता बंद करना होगा मजबूरीवश
मरते सपनों का अंत तुम अपनी आँखों से देखोगे।
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यह सब सुन कर, मैं थोड़ा सा घबराया
सारी उम्र को बस जोड़ने में ही बिसराया
अब मैं कुछ सपनों संग,जीना सीख रहा
और जीवन को सपनों के रंगों से सजाया।
अपर्णा शर्मा
Nov. 14th,25
खुमार
जिन लोगों पर नाज़ था कभी
नशे से चढ़े थे रिश्ते जो कभी।
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गुबार था या वहम था मन का
नशा न रहा पर खुमार था अभी।
अपर्णा शर्मा
Nov. 11th,25
कठपुतली
आज नाच दिखाती कठपुतली मुझसे यूँ कह रही थी
ठुमक ठुमक कर नाचती और वो गीत गा रही थी।
धागों के इशारों पर वो भाव भंगिमा बना रही थी
कभी आगे, कभी पीछे, वो इशारों पर थिरक रही थी
थिरकते हुए कठपुतली मुझसे यूँ कह रही थी
जिंदगी के धागे,किसी को न सौप,ऐसा कह रही थी।
आज नाच दिखाती कठपुतली मुझसे यूँ कह रही थी
ठुमक ठुमक कर नाचती और वो गीत गा रही थी।
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अपने धागे खुद समेट, न फंस किसी के चक्र में
ये केवल अबोध से धागे नहीं, तार है आत्मा के
नचाने वाला जब समेट लेता है इन धागों को
टूट कर मृत समान, निर्जीव हो जाती हूँ, कह रही थी
आत्मा का धागा टूटने से जीवन निष्क्रिय, ऐसा कह रही थी।
आज नाच दिखाती कठपुतली मुझसे यूँ कह रही थी
ठुमक ठुमक कर नाचती और वो गीत गा रही थी।
अपर्णा शर्मा
Nov. 7th,25
