हिम के पिघलते ही
आविर्भाव होते ही
निकल पड़ी गंतव्य को
रिसती, अविचल सी.
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अल्हड़पन से मचलती
कंकर, पत्थरों को रौंदती
कुछ को हटा, कुछ साथ ले
प्रेम-परकाष्ठा में विकलती .
शनैः शनैः, बनी वो विक्षनरी
शांत बहती,अत्यंत धीर धरी
वृद्धा हो, अशेष पतली धारा
लक्ष्य को आतुर, मार्ग खोजती.
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अंत में,अस्तित्व खो समन्दर हुई
मीठी सी नदी अब खारी हो गई
चटकी तो होगी चाहत और डिगा होगा विश्वास भी
आखिर क्या थी मैं ? क्या हो गई?
अपर्णा शर्मा
Nov.17th,23
सीख
गिरते-उठते, चलना सिखा गई जिंदगी
चलते-चलते रास्ते सूझा गई जिंदगी
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जिंदगी में रास्ते तराशने की जुगत में
जिंदगी को बेहतर जीना सिखा गई जिंदगी।
अपर्णा शर्मा
Nov14th,23
रौनक
पंच दिवसीय पर्व, घर-घर खोज रहा रौनक को
मार्ग तिराहे,चौक-चौबारे,लुभा रहे हर दिल को।
हर आँगन,सज रही, रंगों भरी रंगोली
नित-नई अल्पना,मनभावन खूब उकेरी।
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घर-आंगन में,चमक धमक की दिवाली आई
रात में रंग रंगीली लड़ीया बतिया खूब बनाई।
इनके मध्य, मस्ताना कंदील,बना है,कृष्ण कन्हैया
खील,बताशे,खांड-खिलौने देख मन हुआ ललचईया।
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आँगन बैठी, बूढी दादी, न जाने चुप क्यों बैठी है ?
सारी रौनक उड़ी यहाँ से,दूजे घर अब वो बसती है।
अपर्णा शर्मा
Nov.,10th,23
