मैं बहता नीर
कहते फकीर
एक दम फक्कड़
जानू न लकीर।
रोंद दिए रास्ते
तोड़े झूठे वास्ते
नए मार्ग पर
चले हँसते हँसाते।
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लकीर पड़ी रही
ठोकरे खा रही
क्षीर सी जिंदगी
लुत्फ उठा रही।
जो लकीर से बंधे
हाल फकीर से कसे
अक्ल पर पत्थर डाल
वहीं पत्थर घिस रहे।
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उठो! अपने को पहचानो
अपनी शक्ति को आजमालो
अंतरंगी सी इन लकीरों में
सुनहरी तकदीर सजालो।
अपर्णा शर्मा
Jan.5th,24
कैलेंडर
कुछ ख्वाहिशें,जो ख्वाब थी ,बन गई
उस ख्वाब को अब फिर हौसला दे गई
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बारह मास के इस तारीख-ए-गुच्छ में
उम्मीद की रोशनी फिर दीदार दे गई.
अपर्णा शर्मा
Jan.2nd,24
गलत
हर गलत को जब जब सही किया
तब तब नया व्यक्तित्व गढ़ता गया.
हर गलती समझदार बनाती रही
यूँ मासूमियत से दूर होता गया.
हर गलत पर इंसान बनता रहा
और अपने से,बहुत दूर होता गया.
कुछ बहुत सही सा था मेरे लिए
वो गलत सा सबको चुभता गया.
जब गलत को गलत कहा जोर देकर तब वजूद सच का खो सा गया.
अपर्णा शर्मा
Dec.29th,23
