धरती ने कुहासे का आवरण हटाकर देखा,अपने सम्मुख माघ को पाया
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धरा मुस्काई और प्रकृति ने कहा आह ! फिर बसंत आया।
अपर्णा शर्मा
Feb.6th,24
वृक्ष की पत्तियों से वार्ता
मेरे वज़ूद से,दूर हो कर,यहाँ-वहाँ तो,हो गए हों
मौसम के बेमौसम होते ही,बिखर से जो गए हो।
ये ना सोचना,तुम्हारा अलग होना वज़ूद खोना है
तुम्हारे निशाँ,मेरे होने का,सबब जो बन गए हैं।
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पीले पत्ते ही अलग कर सकता है ये जालिम मौसम
नई कोपलों को रोके,वो मौसम कभी देखे नहीं गए हैं।
तुम्हारी शहादत को, मैं कभी भूल सकता ही नहीं
ऊँचाईयां हो,या फैलना तुम संग ही मैंने सब पाया है।
तुम अभी तक मेरे आस-पास,मेरी मिट्टी में हो पड़े
वज़ूद मुक्कमल से पहले,मेरे लिए,खाद भी बन गए हों।
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रे पत्तियों,तुम सिर्फ तने पर सजी ही,खूबसूरत दिखती नहीं
मिट्टी में रल कर,सदा सुंदर जीवन वनस्पति को देती रही हो।
अपर्णा शर्मा
Feb.2nd,24
गुल्लक
जब बैठेंगे,तसल्ली से, उम्र के आखिरी मुकाम पर
बेफिक्र रफ्तार-ए- जीस्त से रखे होंगे हाथ,हाथ पर।
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खोलेंगे गुल्लक का ताला लगा कर यादों की चाबी
जी जाएगी जिंदगी फिर से,इस जमापूंजी को देख कर।
अपर्णा शर्मा
Jan.30th,24
*जीस्त: जिंदगी
