अंत में, अस्तित्व खो कर समन्दर हो गई
मीठी नदी,समंदर में मिल कर खारी हो गई
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चटकी तो होगी चाहत और डिगा होगा विश्वास भी
आखिर क्या थी मैं? जो प्रेम में अपना सत्व खो गई।
अपर्णा शर्मा
May 7th,24
पलाश
पहाड़ों के आगोश में
दिलों के दबे अरमान से.
जब खिलते हैं पलाश
मचलती है फिर तलाश।
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जो बिछुड़ गया पत्र सा
पतझड़ के वियोग सा
खिला गया फिर बसंत
आ गया फिर सैलाब सा।
शंख सा शुभ आकार लिए
वनों में,दिलों में आग लिए
नदी सी निरव जिंदगी में
फिर वहीं अरमान सुलग गए।
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तेरे आगमन के अनंत होते इंतजार में
एक पुष्प और जुड़ा उस तेरे पुष्प हार में
जिस बरस ना खिलेगा जब ये पलाश
आखिरी बरस होगा शायद तेरे इंतजार में।
अपर्णा शर्मा
May 3rd,24
ईश्वर
बहुधा उन्हें हर बात पर मौन देखा है
भाव शून्य होते हुए अक्सर देखा है।
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धीरे धीरे एक स्थिरता की स्थिति में
माता पिता को ईश्वर होते हुए देखा है।
अपर्णा शर्मा
April 30th,24
