जन्म जन्मांतर तक सब सुनती रही
सभी के राज,वो अपने तक समेटे रही
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हाँ,वो दीवार ही थी हर रिश्ते की
जो चुप रहकर रिश्ते निभाती रही.
अपर्णा शर्मा
June 4th,24
दोस्ती
रिश्तों के बगीचों में,महकता फूल है दोस्ती
समय की चोट पर, ठंडा मरहम सी है दोस्ती
उम्र को पछाड़कर कर जिंदगी से मिलाती
जिंदगी को खुशनुमा सफर बनाती हैं दोस्ती.
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अपनेपन की चादर को दिल में बिछा कर
सभी ग़मों को रेशमी धागा बना कर
अपने एहसासों के फूल-बूटे काढ़ कर
नई कशीदाकारी से दुनिया सजाती हैं दोस्ती.
मकानों के सूनेपन को ठहाकों में बदल देती
हर छोटी सफलता को बड़ी सी मंजिल बना देती
बात बात पर दावतों का एलान करने वाली
जिंदगी को जवाब देती लाजवाब होती हैं दोस्ती.
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कभी बोझिल से पलों को दराजों में दबा देती
खुशियों को, बैठकों की शोभा बना देती
जीवन की हर दशा को अलमारी में सजा देती
मसखरी संग,जिम्मेदारी भी खूब निभाती हैं दोस्ती.
अपर्णा शर्मा
May31st,24
‘मैं’
जब जब ‘मैं’जीता है,तब तब ‘हम’ हार गया
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रंग बदलती दुनिया में,रिश्ता यूँ बेहाल हुआ।
अपर्णा शर्मा
May28th,24
