छल

अपना बना कर वो,साथ चलता गया
धीरे-धीरे सभी से,बहुत दूर करता गया।
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समझ न सका,वो दोस्त रहा या रहा दुश्मन
जो अपनों से दूर ,तन्हा कर,सबकुछ हो गया।
अपर्णा शर्मा
August 27th, 24

निन्यानवे का फेर


जीवन का बड़ा ही,अजब गजब सा खेल है
अक्सर मुझको लगता, ये निन्यानवे का फ़ेर है.
सारा जीवन शत प्रतिशत खुशियों की चाह रहती है
पर कुदरत भी, सौ में एक सुख की,कटौती कर देती है।
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इसी एक सुख की चाह में, जीवन से उचटा रहता मन
कैसे मिले? कब मिले? इसी सब में खोया रहता मन
और उन निन्यानवे सुख को सिफर करता है मानव
एक के पीछे दौड़-दौड़ कर,आधा कर लेता तन मन।

कभी खुदा जब, जीवन में, सभी सौ सुख दे देता है
मानव उसमें खोया-खोया, सब कुछ भूला सा रहता है
तभी अचानक, एक दुख जो दाखिल हो जाए, जीवन में
वो एक दुख ही, जीवन के सौ सुख पर भारी होता है।
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इस जीवन में, जैसा है, जितना मिला वरदान में
उसमें ही दुनिया खोजे और सदा जिए वर्तमान में
धन में ही नहीं, इस जीवन में भी, निन्यानवे का फ़ेर है
छीन लेता,जो सारे सुख चैन,सो, जिए सब इत्मीनान में।
अपर्णा शर्मा
August 23rd,24

जाल

सुबह-शाम बेहतर जिंदगी बनाने को निकले
बेहतरीन के फ़ेर में,जिंदगी तमाम कर निकले।
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बेख़बर से,फंसते गए माया के इस महा जाल में
और हर तरफ अवसाद में डूबे लोग दिखे।
अपर्णा शर्मा
August 20th,24

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