जिस घर मैंने जन्म लिया
लाड़,प्यार और तकरार किया
उनको रोता कैसे छोडूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।
जिन गलियों में पतंग सा उड़ा
यारी,दोस्ती का इतिहास बना
उनको कैसे भूलूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।
भविष्य के उज्ज्वल होने में
दबाव बहुत हो मस्तिष्क में
नए विकल्प मैं खोजूगा
मैं जीना न छोडूंगा।
इंजीनियर,डॉक्टर ही जीवन नहीं
कोई काम छोटा समझूँगा नहीं
इक खिड़की मन की खोलूँगा
मैं जीना न छोड़ूंगा।
बेहतर भविष्य खुद बन जाएगा
ग़र बेहतर मनुष्य बन जाऊंगा
मैं पलायन न अपनाऊंगा
मैं जीना न छोडूंगा।
अपर्णा शर्मा
Sept.6th,24
पहचान
मोहब्बत-ए-पैगाम,हर्फ दर हर्फ दिलों में घुलता गया।
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हर्फ ही हैं,जो इंसान की इंसान से पहचान करा गया।
अपर्णा शर्मा
September 3rd, 24
विवाह अब मात्र आयोजन
जब से,देश में ,विवाह होने लगे हैं आयोजित
घर से दूर,मैनेजर करने लगे हैं,सब समायोजित।
जहाँ दोनों पक्षों के ओर की, संपन्नता को तौला जाता
फिर उसे क्रमबद्ध योजना के तहत किनारे लगाया जाता।
अब रिश्तेदार भी, विवाह में रस्म अदायगी को होते उपस्थित
भावनात्मक रूप से दूर, दूर-दूर तलक रहते है अनुपस्थित।
सब अजीब सी दौड़ में फंसे, एक दूजे को नीचा दिखाते
इस सब में वर-वधु, शुभ आशीषों से वंचित रह जाते।
आयोजित विवाह में, रीति-रिवाज नाम मात्र को होते
अधिकांशत रिवाज, अब दिखावे और बनावट के केंद्र ही होते।
दोनों पक्ष, पूरे विवाह, एक दूजे को पैसे से तौलते
निभाव, कर्तव्य, जिम्मेदारी की सीख कहाँ देते?
जब तक विवाह,घरों में संस्कार के लिए जाना गया
विवाह एक मजबूत संस्था सा पोषित होता गया।
विवाह जीवन का एक संस्कार नहीं व्यापार बन गया है
जब से विवाह एक अनूठा सा आयोजन बना दिया गया है।
सच यह भी है,आयोजन की उम्र कब लंबी होती है?
एक आयोजन पूरा,दूजे आयोजन की तारीख पक्की होती है।
अपर्णा शर्मा
August 30th,24
