उसे समझदार कह कर
छीन लिया उस से
दुलार, खिलौने और बचपन.
फिर समझदार कहा
दूर हो गया उस से
जिद,बेबाकी और अल्हड़पन.
समझदार होते ही
लिपट गई उस से
जिम्मेदारियां और खालीपन.
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,24
(अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)
उसे समझदार कह कर
छीन लिया उस से
दुलार, खिलौने और बचपन.
फिर समझदार कहा
दूर हो गया उस से
जिद,बेबाकी और अल्हड़पन.
समझदार होते ही
लिपट गई उस से
जिम्मेदारियां और खालीपन.
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,24
(अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)
मना कर त्योहार रोशनी का
माहौल धुआँ-धुआँ हो गया
करके द्रुत आक्रमण तन पर
मन को बेहद बीमार कर गया।
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कुहासे और धुएँ का मिश्रण
धुन्ध बन कर पसर गया
सूरज की आस में हर कोई
एक किरण को तरस गया।
त्योहारों का मद माहौल जो
सभी का पोर-पोर भीगा गया
प्रदुषित होता हमारा पर्यावरण
स्वास्थ्य का पाठ भी पढ़ा गया।
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वो गुलाबी सर्दियों की लुभाती दस्तक
बीते दिनों की मायूस दास्ताँ बन गई
स्याह हुए परिवेश में फैला धुँआ
हर साल का सिलसिला बन गया।
अपर्णा शर्मा
Nov.15th,24
कलियों को मात्र उपस्थिति से खिला दे
स्नेह भाव से पुष्पों को संरक्षित कर दे।
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जो हर भाव को साकार करने का रखे हौंसला
तो क्यूं न, क्यारी पुनः पुनः हृदय उसी पर वार दे।
अपर्णा शर्मा
Nov.12th,24