ऑनलाइन क्लास में
मुझको कुछ न भाता है।
सुबह सवेरे अलसाया सा
मुझको फोन उठाता है।
ड्रेस पड़ी अलमारी में
किताबें बस्ते में सोती हैं।
बिन दैनिक क्रिया के ही
मेरी क्लास होती है।
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सारा दिन मैं पढ़ता हूँ
ऐसा माँ समझती है।
सारी पढ़ाई, मैं ही जानू
सर पर से गुज़रती है।
मास्टर जी मेहनत कर
अपना विषय पढ़ाते हैं।
पर ऑनलाइन क्लास में
हम कुछ समझ न पाते हैं।
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अब इन लंबे इतवारों से
मैंने तौबा करनी है।
बस स्कूल खोल दो मेरे
मुझ को पढ़ाई करनी है।
अपर्णा शर्मा
March28th,25
कभी-कभी
कभी-कभी अवचेतन मन में भावों के बादल घिरते है
तभी-तभी शब्दों के कोलाहल में अर्थ खोने लगते हैं।
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व्यस्तताओं का,उच्चतम बिंदु के,उच्च तक बढ़ जाना
और कभी गहन खालीपन,भावों को खाली कर देते हैं।
अपर्णा शर्मा
March25th,25
विस्मृति
अर र र पहचानो ये क्या हो रहा है
अर र र संभाल लो ये क्या हो रहा है।
चलते चलते अचानक रुक जाता हूँ
बोलते बोलते बातों में बहक जाता हूँ
सोचता हूँ बहुत,कि सब भूल जाता हूँ
अर र र बताओ थोड़ा रुका हूँ या थका हूँ।
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गणित के सवाल अब पढ़ नहीं पाता
सवाल का जवाब अब बनाया नहीं जाता
शब्द और भाव जाल में अक्सर फंसता हूँ
अर र र बताओ! कठिन है सब या हैरान हूँ।
बच्चों के संग,खुद को वरिष्ठ समझ बैठा
वरिष्ठ समूह में, बिल्कुल ही नादान दिखा
धमाल भी न कर सका,न संजीदगी से जिया हूँ
अर र र बताओ! क्या जिंदगी को समझ न सका हूँ।
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कभी-कभी भूलों को पहचानने की कोशिश में
उलझा रहता हूँ अपनी ही रची कशमकश में
उम्र के नहीं, काम के बोझ के कारनामों में दबा हूँ
अर र र बताओ! क्या विस्मृत सा स्मृतियों में जी रहा हूँ।
अपर्णा शर्मा
March21st,25
