यूँ तो हाथ दोनों तरफ से ही बढ़े थे
निभाने के वादे भी दोनों ने गढ़े थे।
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अचानक हाथ छूटे और वो दूर हो गए
फिर भी एक दूजे के इंतजार में खड़े थे।
अपर्णा शर्मा
jan. 27th,2026
बसंत और प्रेम
हृदय में बसते हों तुम
नयनों में दिखते हो तुम
आँखों में छुपी है भेंट हमारी
साँसे कहती कब आओगे तुम।
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तुम बिन सूनी हुई सब बतिया
अब न भाती मुझको सखियाँ
मुझमें अब,तुम ही,तुम बसे हो
तुम तक सिमटी है मेरी दुनिया।
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आओ! मुझको गले लगाओ
विकट विरह को परे हटाओ
रस्ता तकती अब सूखी अखियां
सुप्त हृदय में प्रेम लौ जलाओ।
अपर्णा शर्मा
Jan.23rd,2026
कशमकश
अजीब सी कशमकश में जी रहे हैं वो
हर नज़र को नज़रअंदाज कर रहे हैं वो।
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जो कभी देखते ही,एक दूसरे को गले लगते थे
मन से कोमल पर,बाहर से सख्त हो रहे हैं वो।
अपर्णा शर्मा jan.20th,2026
