जब चला था अनजानी राहों में
सपनों भरी मंजिल की बाहों में
थक कर, जब भी लगा सुस्ताने
मन बोला, आ अब लौट चले।
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कर के अथक प्रयासों को
पाकर सुखद परिणामों को
जब था हल्का सा मुस्काया
मन बोला, आ अब लौट चले।
काँटों पर चलते इस जीवन में
अंगारों से जलते इस जीवन में
जब भी शीतल बयार बही
मन बोला, आ अब लौट चले।
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इक दिन मैंने मन को ही सुना
सच में उस आँगन लौट चला
जाकर वहाँ सबसे अनजान हुआ
मन फिर बोला, आ अपनी मंजिल लौट चले।
अपर्णा शर्मा
Feb.13th,26
आईने में हो तुम
कभी तुम्हीं आईना थे
अब आईने में हो तुम
संवारता रहा मुझे आईना
उसमें दिखते रहे हो तुम।
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नयनों में गहराता काजल
यादों का लहराता बादल
सुर्ख होते गालों की लाली
आईना कहे सारी हालत।
केशविन्यास करुँ तब ये अलकें
न सुलझे,न संवरे ये काली जुल्फें
तेरी धुन पर करती ता ता थईया
आईने में ये अदा खूब ही झलके।
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प्रेयसी का बस एक निवेदन
सारे श्रृंगार तुझको ही अर्पण
आ जाओ,कहती ये धड़कन
शायद बोल उठे आज ये दर्पण।
अपर्णा शर्मा
Feb.6th, 2026
परिधान और रिश्ते
कच्चे सूत से बने वस्त्रों को पहन कर खद्दर से मजबूत होते थे रिश्ते
खूब झटक,पटक के बाद भी उम्र भर निभाए जाते थे रिश्ते।
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जब से आया है नाजुक और कोमल रेशमी परिधानों का ज़माना
तब से विशेष रखरखाव के बाद भी, धीरे-धीरे दरक रहे हैं रिश्ते।
अपर्णा शर्मा
Feb.3rd,2026
