लौटा नहीं नासमझी का वो निराला वक़्त
समझ आते ही,जो रूठ गया बचपन
और ना ही पलट कर सामने आया
ख्यालों से भरा चपल लड़कपन।
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लौटे नहीं ,जो कभी थे बेवक्त बिछड़े
स्मृतियाँ से भरी अब वे सिंदूरी शामें
घर के,हर कोने, दालान में समाकर
बसे है निशाँ उन्हीं के अहसासात के।
लौटे नहीं वो शानदार सुनहले दिन
काश की आस में गुजरे स्वप्निल छिन।
जिए थे कभी जो नम दिल के एहसास
सीले पड़े है अफ़सानों के वो पलछिन।
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लौटता कुछ भी नहीं इस संसार में
जैसे नहीं लौटते समय,नदी और प्यार
कल्पना सागर में तैरता वो खूबसूरत ख़्याल
चाहे हो,अचानक जेहन में,कौंधता विचार।
अपर्णा शर्मा
Sept.11th,2026
