हे पुरुष!

हे पुरुष!
बिन स्त्री तुम निरीह से
सदा अस्तित्व से परे
संबल बन सभी का
खुद को गवांते जा रहे।
https://ae-pal.com/
हे पुरुष!
अपने लिए भी जियो जरा
परवाह से तू क्यूँ कर डरा
सबके लिए जीता रहा सदा
जरूरत पर अपने करे किनारा।
https://ae-pal.com/
हे पुरुष!
सब कुछ कैसे सह लेता
अपनी पहचान खो देता
पुरुषत्व का कल्पित ताज
और भी बोझ बढ़ा देता।
अपर्णा शर्मा
Nov.19th,23
( अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर)

विश्वास

हिम के पिघलते ही
आविर्भाव होते ही
निकल पड़ी गंतव्य को
रिसती, अविचल सी.
https://ae-pal.com/
अल्हड़पन से मचलती
कंकर, पत्थरों को रौंदती
कुछ को हटा, कुछ साथ ले
प्रेम-परकाष्ठा में विकलती .

शनैः शनैः, बनी वो विक्षनरी
शांत बहती,अत्यंत धीर धरी
वृद्धा हो, अशेष पतली धारा
लक्ष्य को आतुर, मार्ग खोजती.
https://ae-pal.com/
अंत में,अस्तित्व खो समन्दर हुई
मीठी सी नदी अब खारी हो गई
चटकी तो होगी चाहत और डिगा होगा विश्वास भी
आखिर क्या थी मैं ? क्या हो गई?
अपर्णा शर्मा
Nov.17th,23

सीख

गिरते-उठते, चलना सिखा गई जिंदगी
चलते-चलते रास्ते सूझा गई जिंदगी
https://ae-pal.com/
जिंदगी में रास्ते तराशने की जुगत में
जिंदगी को बेहतर जीना सिखा गई जिंदगी।
अपर्णा शर्मा
Nov14th,23

Blog at WordPress.com.

Up ↑