खाली हाथ*

जीवन में एक से बढ़कर एक मिलता रहा
उनके बिना जीना नामुमकिन सा लगता रहा.

जीवन में रच बस कर ,जीवन का सुकून से लगे
सोचता,कुछ ना छूटे,सब यूहीं मिलता रहे.
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हर वस्तु,मित्र,रिश्ते और शहर भी रूह से जुड़े रहे
इनके बिना जीना भी क्या जीना सा लगता रहे.

छूट गए सब, समय के साथ साथ और खाली हाथ रह गए
शायद इसको कहते हैं कि हम हाथ मलते रह गए।
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अब सुबह शाम की दवा बताए,कि तेरे बिना भी क्या जीना
यहीं है जीवन के भंवर में,सांसो की नाव को भरसक खेना।
अपर्णा शर्मा
March29th,24

मायूस घर

किसने कहा, कि त्योहार केवल इंसान ही मनाते हैं
उनके संग संग घर के दरदीवार भी मुस्कुराते हैं
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त्योहार गुजरते ही,जब इंसान निकल जाते है अपनी कर्मभूमि को
मायूस घर,दूसरे त्योहार के इंतजार में, वहीं खड़े रह जाते हैं
अपर्णा शर्मा
March26th,24

होली

सेव,मठरी,गुजिया और दही बड़े
हथियार थे पिचकारी और गुब्बारे।
कच्ची उम्र में दोस्ती के रंग थे पक्कम पक्के
रंगबिरंगे रंगों से उड़ाते थे हम सभी के छक्के।
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शीतल ठंडाई पी पी होली आती थी अपने रंग में
कांजी होली को खूब नचाती थी फिर अपने संग में।
अब ना बनते वैसे प्यार भरे भंग के कुल्हड़
दूर कहीं सो गए सब, अपनेपन के सारे हो-हुल्लड़।
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अब भी रंगों की कमी कहीं नहीं दिखती
पर बचपन की टोली दिल में बहुत कसकती।
मात्र रिवाज निभाना ही रह गए अब त्योहार
दूर से दो बधाई और संजो लो,यादों का संसार।
अपर्णा शर्मा
March25th,24

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