कर अधिकांशत लगता देश हेतु योगदान
जो करदाताओं में भरता उच्च स्वाभिमान।
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पर जब कभी, हद से ज्यादा मन मारना पड़ जाए
तब उन्हीं करदाताओं को, सजा जैसा देता भान ।
अपर्णा शर्मा
Aug.6th,24
मन की बातें
मन में उठती आशंकाओं को
जब कहीं कोई पार नहीं मिल पाता है।
तब दुनिया में कोई एक अनोखा
सब कुछ बड़े धैर्य से सुन जाता है।
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नाते रिश्तों में मन की बातेँ
बिन विश्लेषण नहीं सुनी जाती हैं।
मन में उठी जटिल दुविधाओं पर
जम कर जग हँसाई हो जाती है।
याद आ रही आज बूढ़ी दादी
जो हरदम बुड़-बुड़ करती थी।
अपने से ही कह कर अपनी बातें
किसी को पता न देती थी।
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रोज शाम को पिताजी क्यूं
डायरी लिखते रहते हैं?
समझ आया, वो भी मन की बातें
कागज कलम से साझा करते हैं।
माँ तो माँ है,होती सबसे निराली
बालक को डांट कर जी हल्का करती है।
कुछ ज्यादा ग़र पूछ लिया तो
मार की धमकी भी वो देती है।
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मैं नादां इस सब गाथा से इतना
अब तक यहीं समझ में आए।
इक प्यारा सा दोस्त रखो जो
सुने, पर न कुछ अनुमान लगाए।
अपर्णा शर्मा
Aug.2nd,24
किस से कहें?
मन की बातें ,कहने का तो, मन खूब ही करता है
फिर अपना विश्लेषण,हो जाने से भी मन डरता है।
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सरल हृदय से, जिसने जब अपना हाल सुनाया
सुनने वाला ही अक्सर,सुनकर जग हँसाई करता है।
अपर्णा शर्मा July 30th,24
