शांत पड़े गहरे पोखर में आज हलचल मचती रही
यादों की कंकरी,पुरजोर आज शोर करती रही
जिन यादों को झील सा शांत समझ लिया था अपर्णा
उन यादों के बवंडर में ख़्यालों की सुनामी उठती रही।
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समय के साथ न जाने कब डगर बदलती रही
इसीके साथ मेरा जुनून और चाहत बदलती रही
जहन में शहर आज भी उसी जवानी में है
न जाने क्यूँ कर ये ख़्याल जीती रही।
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कभी शहर छूटने और जुड़ने की फिक्र न रही
छूटने की गमी,मिलने की खुशी की पैमाइश न रही
आज भी शहर का बसंत दिल में बसा है
छूटे हुए मोड़ देखने की कभी ख्वाहिश न रही।
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ख़्यालों के चौराहों की हर गली आबाद रही
ख्वाबों के नुक्कड़ पर टपरी भी गुलजार रही
अपने अंदाज में आज भी यादों को संजोए हुए
हर बात दिल ही दिल में क्यूं बात करती रही।
अपर्णा शर्मा Sept. 13th,24
ख़्याल
शांत पड़े गहरे पोखर में ,आज हलचल मचती रही
यादों की कंकरी, पुरजोर, आज शोर करती रही।
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जिन यादों को,झील सा शांत समझ लिया था अपर्णा
उन यादों के, बवंडर में,ख़्यालों की सुनामी उठती रही।
अपर्णा शर्मा
Sept.10th,24
मैं जीना न छोड़ूंगा
जिस घर मैंने जन्म लिया
लाड़,प्यार और तकरार किया
उनको रोता कैसे छोडूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।
जिन गलियों में पतंग सा उड़ा
यारी,दोस्ती का इतिहास बना
उनको कैसे भूलूंगा?
मैं जीना न छोडूंगा।
भविष्य के उज्ज्वल होने में
दबाव बहुत हो मस्तिष्क में
नए विकल्प मैं खोजूगा
मैं जीना न छोडूंगा।
इंजीनियर,डॉक्टर ही जीवन नहीं
कोई काम छोटा समझूँगा नहीं
इक खिड़की मन की खोलूँगा
मैं जीना न छोड़ूंगा।
बेहतर भविष्य खुद बन जाएगा
ग़र बेहतर मनुष्य बन जाऊंगा
मैं पलायन न अपनाऊंगा
मैं जीना न छोडूंगा।
अपर्णा शर्मा
Sept.6th,24
