जंगल नहीं मांगे गौरैया ने
उसको घर आँगन ही प्यारा था
धरा से आसमाँ तक घुमा उसने
अब घर आंगन भी हुआ पराया था।
अब घर में,न है ऐसा कोई कोना
जिसमें घोंसला बना सके
तिनके, घास फ़ूस से बिन कर
वो अपना घर बसा सके।
थक-हार कर, आँगन में
बैठी चिड़िया सोच रही
मानव जाति हुई लालची
किसी दूजे की न सोच रही।
जंगल काटे,खेत देखो बेच रहे
सुविधा हेतु पर्यावरण को नोच रहे
प्रदूषण की काल कोठरी बनी धरती
इसकी भी सुध, बिल्कुल न ले रहे।
अपर्णा शर्मा
Oct. 25th,24
श्रृंगार
काया को, पूर्ण श्रृंगारित करने से
आभूषणों द्वारा,अलंकृत करने से ।
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ओढ़ कर फिर, मुस्कान अधरों पर
कब छिपी है पीड़ा, इन मिथ्याओं से ।
अपर्णा शर्मा
Oct.22nd,24
अनुपम देन
आँचल में समाया,जहाँ अथाह अमृत निधि
शिशु के जीवन को देता जो अगाथ अंबुनिधि
प्रथम स्पर्श, प्रथम पान और दे कर स्नेह अटूट
अंक में समा सीखाता शिशु को समस्त जीवन विधि।
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सम्पूर्ण धरा की जननी को मिला ये अनुपम वरदान
स्व संततियों को पीयूष बूंद से देती वृद्धि और प्रज्ञान
पयोधर की शक्ति से पोषित है सभी विस्तरित संतति
कोमलता संग कठोरता भी सिखाते जैसे पर्वत की चट्टान।
कभी पुरुष स्त्री पर निंदित दृष्टि के प्रलोभन में
भूलता अंग के कल्याण और कृतज्ञता लोभ में
समझता है वक्ष को यदि मात्र देह का अंग ही
क्यूं भ्रमित है इस मात्र अंग की विषयी लिप्सा में।
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संसार का प्रारम्भ छिपा है, इसी कोमल अंग में
कल्याण और संचालन समाया है वक्ष स्थल में
और साथ ही, मानव का पतन,प्रारंभ होता यही से
शुभ और अशुभ समाहित है सृष्टि की अनुपम देन में।
अपर्णा शर्मा
Oct. 18th,24
