बालक में,बचपन भी, तब तक ही कायम है
जब तक उसके सर पर, माता पिता का साया है।
परिवार में कायम रहता, उनसे संस्कार का गहना है
जब तक परिवार में, बुजुर्गों की रहती महामाया है।
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बिन बुजुर्गों के घर,एक रात में बदलता है
जाने का दर्द ,बच्चों को क्षण में बूढ़ा करता है।
छोड़ के नखरे, कांधा जिम्मेदारी से झुकता है
अखखड़बाज़ी पर खामोशी का पहरा होता है।
बुजुर्ग और बुजुर्गीयत जीवन में, होना महंगा है
बूढ़ा होना,हमारे वज़ूद का प्यारा सा तमगा है।
बचपन और जवानी खोकर पाया यह सम्मान है
निराश गर हुए तो जीवन का भी यह अपमान है।
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मन से शिशु,बुद्धि में ऊर्जा, हो जैसे तरुणाई
तन की झुर्रियां,कहे जीवन की सारी सुघड़ाई।
ऐसा ग़र हम कर पाए तो बुढ़ापा जी जाए
अपने प्रियों के मध्य अमिट छाप लगा जाए।
अपर्णा शर्मा
Nov.1st,24
कूपमंडूक
संतोष धन सबसे बड़ा, सुनकर मिले अथाह सुकून
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जिसने इस पर अमल किया, कहलाया कूप मंडूक।
अपर्णा शर्मा
Oct. 29th,24
बेबस गौरैया
जंगल नहीं मांगे गौरैया ने
उसको घर आँगन ही प्यारा था
धरा से आसमाँ तक घुमा उसने
अब घर आंगन भी हुआ पराया था।
अब घर में,न है ऐसा कोई कोना
जिसमें घोंसला बना सके
तिनके, घास फ़ूस से बिन कर
वो अपना घर बसा सके।
थक-हार कर, आँगन में
बैठी चिड़िया सोच रही
मानव जाति हुई लालची
किसी दूजे की न सोच रही।
जंगल काटे,खेत देखो बेच रहे
सुविधा हेतु पर्यावरण को नोच रहे
प्रदूषण की काल कोठरी बनी धरती
इसकी भी सुध, बिल्कुल न ले रहे।
अपर्णा शर्मा
Oct. 25th,24
