इन सुर्ख हाथों में छिपे होते,अनंत एहसास
पिता की उदासी और पिया का अनुराग।
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दो घरों में बंटती हुई,बेटियों की शख्सियत
और घिरे होते अनिश्चितताओं के ढेरों बादल।
अपर्णा शर्मा
June3rd,25
विदा (चले गए)
वो जब हम को छोड़ गए
यादें सब यहीं छोड़ गए
खाली खाली इस मन में
अफ़साने बन कर चले गए।
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सूनी डगर से जब निकलो
हर रस्ता उनकी बात कहे
उन बिन,उनकी बातों को
बिन बतयाए चले गए।
दिन को काटे, रात को जागे
वक़्त ठिठका सा वहीं खड़ा
कोई न पूछे? कैसे बीत रही
अनजाने बन वो चले गए।
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विस्मृतियों के वृक्ष उगा कर
अमरबेल सी यादें उलझा कर
पक्षियों के कलरव मधुर रस में
क्रंदन करता सब छोड़ गए।
अपर्णा शर्मा
May 30th,25
फलसफा
जब वालदैन द्वारा,अपने ही बच्चों को अपना वालदैन बनाना
जैसे, जहां से शुरु किया सफर, फिर वहीं आकर ठहर जाना।
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जी कर पूरी जिंदगी का चक्कर, और एक फलसफा कह जाना
फिर एक सुबह खुद अफ़साना बन, दुनिया को अलविदा कर जाना।
अपर्णा शर्मा
May, 27th,25
