इज़हार

जब शब्द मौन हो जाए,

तब आँखें बात करती है।

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सुप्त पड़ी सम्वेदना का ,

खुलकर इज़हार करती है।

उम्र

उम्र क्यों बिला वज़ह मजबूर कर रही

ज़िंदगी सदा से जीने की वज़ह दे रही।

उम्र जब देखो पाबंदी की बात करती है

ज़िंदगी वहीं पुरजोश जीना सिखाती है।

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यूँ न समझ, ए उम्र! के रुकावटें न थी रास्ते में

फिक्र को, तमाम कर गई ज़िंदगी अपनी हस्ती में।

जब अपना अक्स देखती है उम्र आईने में

उम्र शरमा जाती है, ज़िंदगी के मुस्कराने पे।

दस्तक

फिर दिल के दरवाज़े पर दस्तक दी है

ख़्वाबों ने हक़ीक़त को आवाज़ दी है

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खुले रास्ते अब बढ़ते जाना सिखा रहे हैं

हम भी मंज़िल से बेफिक्र, चले जा रहे हैं। (अपर्णा शर्मा)

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