चार सलाई बुनकर दो सलाई उधड़ती जा रही है ज़िंदगी।
ऐ ज़िंदगी! लिहाज़ कर, संवर जा, छोड़ दे ये दिल्लगी।
चार सलाई बुनकर दो सलाई उधड़ती जा रही है ज़िंदगी।
ऐ ज़िंदगी! लिहाज़ कर, संवर जा, छोड़ दे ये दिल्लगी।
जब-जब मोह हुआ माया से,
तिलिस्म का संसार खड़ा हुआ।
जब-जब भान हुआ सच का,
तिलिस्म तो ताश का महल हुआ।
सवेरे ही उससे मेरी मुलाकात हो गई.
देखते ही उस को मुस्कान खिल गई.
वोभी झूमकर हवा में खिलके मुस्कराया.
खूबसूरती से अपना हाल कह सुनाया.
मैं भी स्पर्श कर,उसे हौले से मुस्कराई.
दोनों के जीवन में अनेकों समानता पाई.
दुनिया की नज़र में हम दोनों काँटों से घिरे हैं.
नहीं जानते वो,यहीं हमारे सुरक्षा के दायरे हैं.
अपनों के काँटे कहाँ,कभी अपने ही चुभे है.
यहीं तो हमारे खिलने में सहायक बने है.
जन्म और कर्म भूमि दोनों की ही अलग है.
जीवन में दोनों के गुणों से महक ही महक है.
तेरे और मेरे खिलने, महकने के ज़ुदाअंदाज़ है.
दोनों ही अपनी बगिया के महकते गुलाब है.