मन का फेरा

गाँव बसा है तन मन में
हर दम संग में जीता है
शुरुआत में पढ़ा गॉव से
माँ का आँचल भी गीला है
यही तो मन का फेरा है।

शहर में जब से आया
सपनों का पीछा करता है
अपनों के संग रहना चाहा
तो सपनों से नाता टूटा है
यहीं तो मन का फेरा है।


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पढ़-लिख,नाम करा बाबा का
बाबा से भी नाता टूटा है
देश-विदेश खूब नाम कमाया
शहर तो अपना छूटा है
यहीं तो मन का फेरा है।

इतना सब कुछ पाया कमाया
कहीं न रच बस पाया है
सेवानिवृत हो,सब छोड़छाड़ के
घर को वापिस आया है
यहीं तो मन का फेरा है।


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सुबह खेत,शाम हाट करे है
सारे संगी घर को आए हैं
बचपन को भरपूर जिए है
फिर से समय फिराया है
यहीं तो मन का फेरा है।

संवाद

मन ही मन होता जब संवाद
हर प्रश्न के उत्तर होते लाजवाब।
जो मन को खुशी से झूमा दे बात
संतुष्ट हो मन,न उठे फिर विवाद।

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अंतर्मन की हर दुविधा का प्रतिकार होता
स्व संवाद में मन सब को पटखनी दे देता।
संवाद के हर गुण में, मन दक्षता रखता
शिकायतों का पुलिंदा पूर्ण समक्ष रखता।

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असल में ,जब संवाद के क्षण से टकराए
मिसरी सी आवाज पर धराशायी हो जाए।
त्याग कर सब विवाद,मतभेद भूल जाए
बात करने से,मन धवल सा चमक जाए।

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