गहराती रेखाएं चुगली कर रही,उम्र के बढ़ते पड़ाव की
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महसूस करा रही, कि तजुर्बे को, एक उम्र दांव पर थी।
अपर्णा शर्मा 9.5.23
गहराती रेखाएं चुगली कर रही,उम्र के बढ़ते पड़ाव की
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महसूस करा रही, कि तजुर्बे को, एक उम्र दांव पर थी।
अपर्णा शर्मा 9.5.23
न मैं ही गई, न मन से गया मोह
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अब बैठे सोच रहे, मुक्ति कैसे हो.
अपर्णा शर्मा
2.5.23
खामोश सी जिंदगी यूहीं गुजर जाती
गर जिंदगी में तूफान से दोस्त न होते ।
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जो चने के झाड़ पर हमें चढ़ा कर
फिर जिंदगी भर कभी उतरने नहीं देते ।