गिरते-उठते, चलना सिखा गई जिंदगी
चलते-चलते रास्ते सूझा गई जिंदगी
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जिंदगी में रास्ते तराशने की जुगत में
जिंदगी को बेहतर जीना सिखा गई जिंदगी।
अपर्णा शर्मा
Nov14th,23
गुमाँ
नादां हवा को ना जाने क्यों गुमाँ हो गया है चिराग बुझाने का।
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उसे इल्म नहीं कि बाती में रोगन आज भी है मोहब्बत का।
अपर्णा शर्मा
Nov.7th,23
अनकही
ना उस ने कुछ कहा कभी
ना मैंने करी कोई बतकही।
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फिर भी पहुँच गई उसकी
मुझ तक वो सारी अनकही।
अपर्णा शर्मा
Oct.31st,23
