फिर बसंत आया

धरती ने कुहासे का आवरण हटाकर देखा,अपने सम्मुख माघ को पाया
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धरा मुस्काई और प्रकृति ने कहा आह ! फिर बसंत आया।
अपर्णा शर्मा
Feb.6th,24

गुल्लक

जब बैठेंगे,तसल्ली से, उम्र के आखिरी मुकाम पर
बेफिक्र रफ्तार-ए- जीस्त से रखे होंगे हाथ,हाथ पर
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खोलेंगे गुल्लक का ताला लगा कर यादों की चाबी
जी जाएगी जिंदगी फिर से,इस जमापूंजी को देख कर।
अपर्णा शर्मा
Jan.30th,24

*जीस्त: जिंदगी

खेल

मन के भाव,जब कलम लिख न सके
झूठ को लिखे और सच कह न सके।
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गुम हो भाव, दिशा,दशा और काल के भय से तब,सच झूठ के खेल में,इंसान जी न सके
अपर्णा शर्मा
Jan.23rd,24

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